Friday, 13 September 2013

जब सुबह की सूरज को देकता हू  
सूरज की किरणों को देकता हू 
बस यही सोचता हु की 
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?

जब हवा को मेहसूस करता हू 
हवा मे छिपी तेरी आहट को मेहसूस करता हू 
बस यही सोचता हु की 
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?

जब तुमारी उस नज़र को देकता हू 
नज़र में चिपी प्यार भरा हसी को देकता हू 
बस यही सोचता हु की 
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?

मै सपने भी देका किया करता हू 
उस सपनो में तेरी कमी मेहसूस करते 
बस यही सोचता हु की
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?

तुम मुझसे पास रहकर भी दूर हो 
जैसे आसमान पास\रहकर भी दूर है 
उस दूरी को करीब लाते -लाते 
बस यही सोचता हु की 
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?
तुम इतनी सुन्दर क्यों हो ?

  -sha(1+nk).